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नहीं कफन,मुझको तिरंगा चाहिए

Published-Aug. 15, 2021, 8:07 a.m.



Written By:Apeksha_Deo
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मरूंगी इस तरह मैं,
देखना तुम लोग देखेंगे !
ज़माने भर की आँखों में ज़रा गौरव भरा होगा।
मरूंगी इस तरह मैं,
काफिले होंगें उठाने को,
और इस धरती को मेरी प्रीति पे अभिमान भी होगा।

की जब जल जाए ये, इसको न गंगा में बहाना तुम !
मेरी इस राख को इस मिट्टी में तुम बस मिला देना
कि बरसों से इसी ने तो मुझे सींचा है, पोसा है,
मुझपर ऋण है इसका तुम ज़रा इसको चुका देना।

देखना तुम रूह जब मेरी निकलेगी रोशनी होगी,
कि ऐसा कर्म कर के मैं मरूँगी, बंदगी होगी,
वो सारे आसमानों के सितारे राह सजाएंगे।
कि मेरी मृत्यु में भी देखना क्या जिंदगी होगी।

ऐ भारत तेरे आँचल तले मैं भी फली - फूली !
और ऐ भारत, मरूँ तो ये ही आँचल तुम उढ़ा देना ।
कि मेरी सांस तो कब की समर्पित कर ही दी तुमको,
अब ऐ भारत मेरी इतनी रज़ा तू न भुला देना।

कि सारे हिंद की सेना से न मुझको सलामी चाहिए!
ना ही मेरी इस आत्मा को फिर गुलामी चाहिए।
न ही रज़ा मेरी कि मरने पर तिरंगा झुक ज़रा जाए,
मुझे तो बस कफन के बदले में मेरा तिरंगा चाहिए !!

-दीक्षा सिंह

Last Edit - Aug. 15, 2021, 8:16 a.m.

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