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बिहार में बहार

Published-July 18, 2020, 1:30 p.m.



Written By:Rashi
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Rashi
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हमारे प्रदेश में कल एक पुल गिरा,
कुछ लोग अस्पतालों के पलंग से गिरे सीधा वार्ड के बाहर। इन नीली बत्ती वाली गाड़ियों का बोझ ना ९ करोड़ की जनता सेह पा रही है ना ही २०० करोड़ की लागत से निर्मित झरझर सा एक पुल।

कोरोना के शुरुआती दिनों में सुना था कि बिहार के नौजवानों का खून गर्म होता है और कंधे मज़बूत। मज़बूत इतने की बेरोज़गारी के बोझ के साथ बाढ़ में फंसे बूढ़े चाचा का बोझ भी ये हंसते खेलते उठा ले सकते हैं।

बात अगर बाढ़ की करें तो गंडक नदी के पानी पर डैम बना के उसे काबू में किया जा सकता है। पर काबू में तो यहां ना कोसी आ पाती है ना ही वोट डालते समय लोगों की जातिवाद भावनाएं।

भावनाएं तो हमने अपने मजदूर भाईयों के लिए काफी आक्रोश कर के दिखाई थीं। ट्विटर पर ट्रेंडिंग तक करवा दिया था 'हैशटैग इंडस्ट्री इन बिहार'। लेकिन टेक्निकली देखा जाए तो बिहार में क्राइम रेट काफी हाई है। जिस कारण मालिक इंडस्ट्री बैठाने से कतराते हैं। ऐसे ही कतराते हुए हमारे मजदूर भाई एक और बार शहर की ओर पलायन करते नज़र आए। अब जिनकी ज़िन्दगी ५ किलो गेहूं देने के बाद भी खुशहाल नहीं हो पाई उनका तो शहर जा के मजदूरी करना ही अच्छा!

यहां तीन -चौथाई जनता गरीबी से बेहाल है। बिना बेड के चल रहे अनेकों अस्पताल हैं। कभी बाढ़, कभी सुखाड़ है। और ओवरऑल देखा जाए तो ' बिहार में बहार है'।

Last Edit - July 18, 2020, 1:36 p.m.

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