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12 रोटियां

Published-Sept. 7, 2020, 9:19 p.m.



Written By:Rashi
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Rashi
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इस OCD त्रस्त ज़माने का
एक चेहरा ये भी है
जिसकी चमड़ी शायद जन्म से इतनी भूरी नहीं थी,
पर जात का तबका नीचा होना
एक सेहमी सी मजबूरी रही थी।
ये मजबूरी किसी को कितना विवश कर सकती है?
क्या इतना की वो इंसानी मैले को अपने सिर पर ढ़ो के प्रवित्त करें?

अक्सर जब हम नाक पर रुमाल और आंखों पर समानीकरण की पट्टी रखे सड़क से गुजरते हैं
तब एक झरझर से शरीर का कोई हमारे मैले में गोते लगा रहा होता है
और उसी नाले का कोई नया निछला ढूंढ
वहीं दम तोड़ देता है।

मैंने सुना था कि जब मैला ढ़ोने के बाद
ये अपने घरों को लौटते हैं
तो इनके बदन से आ रही दुर्गंध से इनके बच्चे
अपनी मां के निर्मल आंचल में मुंह गोत लिया करते हैं।

वैसे ये बेशक कोई अन्य काम भी कर सकते हैं
फूलों के गजरे बेच
घर में फैली बदबू पर
धीमी खुशबू की चादर बिखेर सकते हैं।

पर लोगों के भिन्नाते चेहरे
और इन्हे इनके जात से संबोधित कर रहे स्वर
मैला ढ़ोने से बढ़ते मृत्युदर को भले ही घटा दे
पर नहीं घटा पाते
कागज़ में लिपटी उन 12 रोटियों की कीमत।


अगर हम इस प्रथा के और अन्तर्गत जा के पढ़ेंगे
तो शरीर में एक सिहरन ज़रूर महसूस होगी
और जब किसी को अगली बार ये करता देखे
तो कमज़ोर दिल वालों के हाथों में कपकपाहट भी।
और शायद वे इनके समीप रख भी आयेंगे
12 गर्म सिकी रोटियां।
और तब शायद समाज का सबसे ऊंचा
और सबसे निचला हिस्सा
खड़ा होगा एक समान स्तर पर,
विवश!

Last Edit - Sept. 7, 2020, 9:19 p.m.

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